*जिला भोपाल में जीडीएम दिवस के अवसर पर हुई जागरूकता गतिविधियां*
भोपाल जिला मध्य प्रदेश

*जिला भोपाल में जीडीएम दिवस के अवसर पर हुई जागरूकता गतिविधियां*
(पढ़िए मध्य प्रदेश हेड राजमणि पांडे की रिपोर्ट)
मातृ एवं शिशु रोग रुग्णता के कारणों में जेस्टेशनल डायबिटीज मेलाइटिस एक गंभीर समस्या है जिससे मां एवं शिशु के स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव हो सकते हैं। जेस्टेशनल डायबिटीज मेलिटस के प्रति जागरूकता के लिए शुक्रवार को जीडीएम दिवस पर जागरूकता गतिविधियां हुई।

इस अवसर पर स्वास्थ्य संस्थाओं में जागरूकता एवं परामर्श सत्र व जीडीएम स्क्रीनिंग शिविरों का आयोजन किया गया। जिसमें जीडीएम की जांच एवं गर्भावस्था में शीघ्र पंजीयन करवाने की आवश्यकता के संबंध में जानकारी प्रदान की गई। यह आयोजन जिला चिकित्सालय सहित सिविल अस्पतालों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों एवं हेल्थ एंड वैलनेस केंद्रों में आयोजित किए गए।
जीडीएम कार्यक्रम के अंतर्गत सभी गर्भवती महिलाओं की जांच गर्भ काल में एएनसी चेकअप के दौरान न्यूनतम दो बार की जानी आवश्यक होती है। प्रथम जांच पंजीयन के समय एवं द्वितीय जांच 24 से 28 सप्ताह के भीतर की जाती है। जांच में गर्भवती महिला को 75 ग्राम ग्लूकोस 300 मिलीलीटर पानी में घोलकर पिलाया जाता है। घोल पीने के 2 घंटे पश्चात ग्लूकोमीटर द्वारा ब्लड शुगर की जांच की जाती है।
महिला को गर्भवती होने का पता चलते ही आशा कार्यकर्ता अथवा स्वास्थ्य कर्मी से संपर्क कर अपना पंजीयन एवं जांच आवश्यक रूप से करवानी चाहिए। जेस्टेशनल डायबिटीज मेलिटस वह अवस्था होती है जिसमें गर्भावस्था में पहली बार खून में बड़ी हुई शुगर का पता चलता है या पहली बार गर्भावस्था में खून में शुगर बढ़ जाती है।
गर्भावस्था में शारीरिक एवं हार्मोनल परिवर्तन के कारण शरीर शुगर का इस्तेमाल सामान्य रूप से नहीं कर पाता है इसकी वजह से खून में शुगर का स्तर बढ़ जाता है। यह मां और गर्भ में शिशु के लिए हानिकारक होता है। जीडीएम में पॉजिटिव पाई गई महिलाओं के प्रबंधन के लिए जीवन शैली परिवर्तन एवं आवश्यकता अनुसार चिकित्सा की जाती है। उपचार ना लेने की स्थिति में शिशु का आकार सामान्य से बड़ा होने का खतरा होता है।




