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शासकीय उचित मूल्य की दुकान में राशन वितरण में घोटाले की आशंका, प्रशासनिक संरक्षण पर उठे सवाल

विजयराघवगढ़ जिला कटनी मध्य प्रदेश

शासकीय उचित मूल्य की दुकान में राशन वितरण में घोटाले की आशंका, प्रशासनिक संरक्षण पर उठे सवाल

(पढिए जिला कटनी ब्यूरो चीफ ज्योति तिवारी की खास खबर)

शासकीय उचित मूल्य दुकान के सेल्समेन गरीबों के पेट में डाला डांका लोगों ने लगाया (प्रशासनिक-संरक्षण) का आरोप

विजयराघवगढ़ नगर में संचालित शासकीय उचित मूल्य दुकान भ्रष्टाचार का केंद्र बनती जा रही है। छह वार्डों के गरीब एवं जरूरतमंद हितग्राहियों को राशन वितरण करने वाली इस दुकान पर नियम-कानूनों को ताक पर रखकर लंबे समय से मनमानी किए जाने के गंभीर आरोप सामने आए हैं। आरोप है कि यह दुकान गरीबों के हक पर डाका डालने का अड्डा बन चुकी है, जबकि जिला प्रशासन मूकदर्शक बना हुआ है।

स्थानीय लोगों के अनुसार, दुकान का न तो कोई स्पष्ट पता दर्शाया गया है और न ही नियमानुसार रेट लिस्ट चस्पा की गई है। पारदर्शिता पूरी तरह गायब है। आरोप है कि प्रशासनिक तंत्र की नाक के नीचे, या फिर उसकी मौन सहमति से, वर्षों से भ्रष्टाचार का खेल जारी है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह दुकान एक महिला के नाम पर पंजीकृत है, जबकि व्यवहारिक रूप से इसका संचालन कोई और व्यक्ति कर रहा है, जिससे जिम्मेदारी और जवाबदेही पर बड़े सवाल खड़े हो गए हैं।

शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि इस दुकान में अधिकारियों को “संतुष्ट” करना और गरीबों के हिस्से का अनाज हड़पना एक नियमित प्रक्रिया बन चुकी है। वर्षों से गरीबों के निवाले पर डाका डाला जा रहा है, लेकिन आज तक किसी तरह की ठोस कार्रवाई नहीं हुई।

मामले ने तब और गंभीर रूप ले लिया जब यह आरोप सामने आया कि कुलदीप तिवारी, जो स्वयं को दुकान का संचालक बताता है, शिकायत वापस लेने के लिए दबाव बना रहा है। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि वह भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व संगठन मंत्री जितेन्द्र लोरियाँ का नाम लेकर फोन पर बात कराने की धमकी देता है। हालांकि, दुकान महिला के नाम पर पंजीकृत है, ऐसे में वास्तविक संचालन और जिम्मेदारी को लेकर संदेह और गहरा गया है।

शिकायतकर्ता का यह भी आरोप है कि गरीबों का अनाज पचाकर प्रभावशाली लोगों की जेबें भरी जा रही हैं, और इसी कारण इस पूरे मामले को लंबे समय तक प्रशासनिक संरक्षण मिलता रहा। सवाल यह भी उठ रहा है कि यदि सब कुछ नियमानुसार था, तो फिर शिकायत सामने आने के बाद ही लगातार दो दिनों से अनाज वितरण क्यों शुरू हुआ? क्या इससे पहले कभी नियमों के अनुसार वितरण हुआ था?

यह मामला सिर्फ एक उचित मूल्य दुकान तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है। बिना सूचना, बिना रेट लिस्ट और बिना पारदर्शिता के दुकान आखिर किनके संरक्षण में वर्षों तक संचालित होती रही? प्रभावशाली नामों की धौंस देकर शिकायत दबाने की कोशिश क्यों की जा रही है?

अब जरूरत है कि पूरे मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराई जाए। स्टॉक रजिस्टर, वितरण पर्ची, ई-पॉस मशीन, लाभार्थी सूची और वास्तविक वितरण का भौतिक सत्यापन किया जाए तथा दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। क्योंकि गरीबों के निवाले पर हाथ डालने वालों के लिए नरमी नहीं, बल्कि सख्ती ही न्याय है।

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