खलनायक सिर्फ बुरा इंसान नहीं होता, बल्कि “समाज की असफलताओं का आईना” भी होता है
कटनी जिला मध्य प्रदेश

खलनायक सिर्फ बुरा इंसान नहीं होता, बल्कि “समाज की असफलताओं का आईना” भी होता है
(पढिए जिला कटनी ब्यूरो चीफ ज्योति तिवारी की खास खबर)
भारत दिनभर आशुतोष राणा जन्म दिवस विशेष।
अच्छा” या “बुरा” किरदार नहीं होता — केवल “सच्चा” अभिनय होता है
खलनायक सिर्फ बुरा इंसान नहीं होता, बल्कि “समाज की असफलताओं का आईना” भी होता है
भारत भूषण श्रीवास्तव
भारतीय सिनेमा का इतिहास नायकों की चमक और खलनायकों की छाया से मिलकर बना है। जहाँ एक ओर नायक समाज की आदर्श छवि प्रस्तुत करता है, वहीं खलनायक उसकी छिपी हुई सच्चाइयों का आईना होता है। इसी परंपरा में 1990 के दशक के उत्तरार्ध में एक ऐसा कलाकार उभरा, जिसने खलनायकी को न केवल भयावहता का प्रतीक बनाया, बल्कि उसे मनोवैज्ञानिक और सामाजिक विमर्श का माध्यम भी बना दिया — वह कलाकार है आशुतोष राणा।
खलनायक का पुनर्पाठ: आशुतोष राणा का योगदान
भारतीय सिनेमा में जहाँ अमरीश पुरी, अजीत या प्राण जैसे खलनायक सत्ता, शक्ति और बाहरी भय के प्रतीक रहे, वहीं आशुतोष राणा का खलनायक “अंदरूनी भय” का चेहरा है।
उनके पात्रों में सामाजिक विकार, मानसिक विकृति और सांस्कृतिक पाखंड की परतें दिखाई देती हैं।
वे यह समझाते हैं कि खलनायक सिर्फ बुरा इंसान नहीं होता, बल्कि “समाज की असफलताओं का आईना” भी होता है। उनके अभिनय से भारतीय दर्शक पहली बार यह महसूस करते हैं कि खलनायकी भी एक मनोवैज्ञानिक यात्रा हो सकती है।

दूरदर्शन से फ़िल्मों तक की यात्रा*
आशुतोष राणा का अभिनय-सफर दूरदर्शन के लोकप्रिय धारावाहिक ‘स्वाभिमान’ (1995) से आरंभ हुआ। इस धारावाहिक ने उन्हें पहचान तो दी, परंतु उनकी संवेदनशीलता और गहराई भरे अभिनय की असली झलक हमें बाद में मिली। ‘संशोधन’ (1996) जैसी सामाजिक फ़िल्मों और ‘कृष्ण अर्जुन’ (1997) जैसे एक्शन-थ्रिलर में उन्होंने छोटे लेकिन यादगार किरदार निभाए, जिनसे यह स्पष्ट हुआ कि वे “हीरो” बनने की होड़ में नहीं, बल्कि “अभिनेता” बनने की साधना में लगे हैं।
‘दुश्मन’ (1998): भय और करुणा का संगम*
तन्हा गलियों में पीछा करता, निर्दयी चेहरा और भीतर कहीं गहरे तक बीमार मन — आशुतोष राणा का ‘गोकुल पंडित’ भारतीय सिनेमा के इतिहास में दर्ज हो चुका है।
यह किरदार केवल एक बलात्कारी या हत्यारा नहीं था, बल्कि विकृत मानसिकता की सामाजिक उत्पत्ति का प्रतीक था। निर्देशक तनुजा चंद्रा ने जिस साहस से इस किरदार को लिखा, आशुतोष राणा ने उतनी ही निष्ठा से उसे जिया।

उनकी आँखों में झलकता भय, संवादों में कंपकंपी, और अंत में खामोशी में छिपा दर्द — यह सब दर्शकों को असहज कर देता है, क्योंकि वह “बुराई” हमारे समाज की ही उपज लगने लगती है। फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ खलनायक पुरस्कार (1999) इसी कलात्मक सच्चाई की मान्यता थी।
‘संघर्ष’ (1999): अपराध के पीछे छिपा दर्शन
‘संघर्ष’ में राणा ने फिर एक अपराधी का किरदार निभाया, लेकिन इस बार वह केवल पागलपन नहीं, बल्कि धार्मिक और दार्शनिक अंधविश्वासों का प्रतीक थे। उनका किरदार उस रेखा पर चलता है जहाँ अपराध और अध्यात्म एक-दूसरे से मिलते हैं।
यह भूमिका कठिन इसलिए थी क्योंकि इसमें केवल हिंसा नहीं, तार्किक विकृति और आत्ममुग्धता भी थी — और राणा ने इसे इतनी शिद्दत से निभाया कि वह दर्शकों के अवचेतन में उतर गई। 2000 में उन्हें लगातार दूसरे वर्ष फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ खलनायक पुरस्कार मिला — जो हिंदी सिनेमा में दुर्लभ उपलब्धि है।
सिनेमा और समाज का सेतु
आशुतोष राणा का काम केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि चेतना का आह्वान है। उनके पात्र दर्शक को झकझोरते हैं और यह सवाल उठाते हैं कि “अगर ऐसे किरदार हमारे समाज में पैदा होते हैं, तो दोष सिर्फ व्यक्ति का है या हमारी व्यवस्था का भी?”
इस दृष्टि से देखा जाए तो राणा का अभिनय केवल कला नहीं, बल्कि सामाजिक अध्ययन का विषय बन जाता है। उन्होंने खलनायकी को मनोरंजन से निकालकर सामाजिक संवाद का हिस्सा बना दिया।

दर्शक के भीतर झांकना
आशुतोष राणा उन विरल कलाकारों में हैं जिन्होंने अभिनय को अपनी पहचान से ऊपर रखा। उन्होंने यह साबित किया कि एक कलाकार के लिए “अच्छा” या “बुरा” किरदार नहीं होता — केवल “सच्चा” अभिनय होता है।
उनकी खलनायकी में डर है, पर साथ ही एक करुण सच्चाई भी — जो दर्शक को सोचने पर मजबूर करती है।
भारतीय सिनेमा को यदि आज भी कोई अभिनेता उसकी आत्मा की गहराई में ले जाता है, तो वह आशुतोष राणा हैं — एक ऐसा कलाकार जिसने हमें यह सिखाया कि “अभिनय का सबसे बड़ा उद्देश्य, दर्शक के भीतर झांकना है।”




