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जिला न्यायाधीश ने कहा राजीनामा के माध्यम से प्रकरणों का निराकरण होने से पक्षकारों के मध्य संबंध मधुर बने रहते हैं

तहसील हटा जिला दमोह मध्य प्रदेश

जिला न्यायाधीश ने कहा राजीनामा के माध्यम से प्रकरणों का निराकरण होने से पक्षकारों के मध्य संबंध मधुर बने रहते हैं

(पढिए जिला दमोह ब्यूरो चीफ गजेंद्र साहू के साथ हटा से पुष्पेंद्र पांडेय की खास खबर)

नेशनल लोक अदालत 11 मई के आयोजन हेतु मीडियाजनों के साथ बैठक सम्पन्न

राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण नई दिल्ली एवं म.प्र.राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण जबलपुर के आदेशानुसार प्रिंसिपल जिला न्यायाधीश एवं जिला विधिक सेवा प्राधिकरण अध्यक्ष अजय प्रकाश मिश्र के कुशल मार्गदर्शन में

जिला दमोह एवं तहसील न्यायालय हटा, पथरिया एवं तेंदूखेड़ा में 11 मई को नेशनल लोक अदालत का आयोजन सुनिश्चित किया गया है।

नेशनल लोक अदालत के आयोजन के संबंध में मीडियाजनों के साथ जिला न्यायाधीश एवं जिला विधिक सेवा प्राधिकरण सचिव धर्मेश भट्ट की अध्यक्षता में बैठक का आयोजन ए.डी.आर. भवन जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, जिला न्यायालय में किया गया ।

बैठक में जिला विधिक सहायता अधिकारी रजनीश चौरसिया सहित मीडियाजन मौजूद रहे।

जिला न्यायाधीश एवं जिला विधिक सेवा प्राधिकरण सचिव धर्मेश भट्ट ने बताया 11 मई को वर्ष की द्वितीय नेशनल लोक अदालत आयोजि

लोक अदालत के माध्यम निराकृत होने वाले प्रकरणों की कोई अपील नहीं होती, इस प्रकार प्रकरण का अंतिम निराकरण हो जाता है।

राजीनामा के माध्यम से प्रकरणों का निराकरण होने से पक्षकारों के मध्य संबंध मधुर बने रहते है

दुर्घटना दावा के प्रकरणों में प्रिसिटिंग के माध्यम से प्रकरणों का निराकरण किये जाने हेतु बीमा कंपनियों के साथ प्रिसिटिंग्स आयोजित की जाकर प्रकरणों की सहमति प्राप्त की जा रही है । उन्होंने प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के प्रतिनिधियों से नेशनल लोक अदालत का अधिक से अधिक प्रचार-प्रसार किये जाने का आग्रह किया । लोगों का बढ़-चढ़कर इसमें सहयोग भी मिल रहा है

प्रचार प्रसार भी पूरे उत्साह के साथ किया जा रहा

अधिवक्ताओं की ओर से भी हमें अपेक्षित सहायोग मिल रहा है, जनसाधारण में भी विशेष रूचि दिखाई दे रही है।

उन्होंने कहा लोक अदालत के माध्यम से जिन प्रकरणों का निराकण होता है उसमें दोनों ही पक्षों की सहमति से आपसी राजीनामा के आधार पर अंतिम निराकरण किया जाता है,

इसके पश्चात कोई अपील वरिष्ठ न्यायालय में भी किसी पक्षकार को चुनौती देने की अधिकारिता नहीं होती है और इसकी आवश्यकता भी नहीं होती है।

इस प्रकार से उभय पक्ष की सहमति से जो निराकरण होता है, उसमें दोनों ही पक्षों को संतुष्टि भी मिलती है और अंतिम निर्णय होता है, उसके उपरांत जो उनकी कोर्ट फीस रहती है वह भी उन्हें वापिस दिलाई जाती है।

इस प्रकार न सिर्फ सामाजिक रूप से बल्कि आर्थिक रूप से भी विबाद का उचित और अंतिम निराकरण होता है।

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