*औषधीय फसलों की खेती के संबंध में किसानों को दिया गया प्रशिक्षण, वैज्ञानिक तरीकों से कृषक हुए अवगत*
शहडोल जिला मध्यप्रदेश

औषधीय फसलों की खेती के संबंध में किसानों को दिया गया प्रशिक्षण, वैज्ञानिक तरीकों से कृषक हुए अवगत
रिपोर्टर – (संभागीय ब्यूरो चीफ) चंद्रभान सिंह राठौर
शहडोल/14 अक्टूबर 2022/
उद्यानिकी एवं खाद्य प्रसंस्करण विभाग शहडोल द्वारा दिन शुक्रवार को देवारण्य योजना के अन्तर्गत औषधीय फसलों की खेती पर दो दिवसीय कृषक प्रशिक्षण कृषि विज्ञान केन्द्र शहडोल मे आयोजित किया गया। प्रशिक्षण में किसानों को बताया कि हर पेड़ औषधीय के रूप में उपयोग किया जाता है। प्रशिक्षण में किसानों को आवंला के बारे में जानकारी दी गई कि हर दिन कच्चा आंवला खाने या इसका जूस पीने से दांत और मसूड़े मजबूत होते हैं, इसके अलावा ये सांसों की दुर्गंध भी दूर करता है. ब्लड शुगर को करे कंट्रोल- आंवला में क्रोमियम नाम का तत्व पाया जाता है जो ब्लड शुगर को कंट्रोल करने में काफी उपयोगी होता है डायबिटीज के मरीजों के लिए आंवला एक बेहतरीन फल है इस लिए इसके खेती करनी चाहिए। प्रशिक्षण में किसानों को सब्जियों में जैव उर्वरकों के प्रयोग की जानकारी देते हुए बताया गया कि बीजोपचार हेतु पौध की जड़ों को शोधित करके तथा सीधे मृदा में प्रयोग द्वारा सब्जियों में 200 ग्राम जैव उर्वरक 10-12 किग्रा बीज, शोधन के लिए पर्याप्त होता है।
जैव उर्वरक (200 ग्राम) को 400 मि.ली. पानी में मिलाकर उसमें 50-100 ग्राम गुड़ या चीनी मिला लें। ध्यान रहे कि घोल अधिक पतला न रहे। तैयार गाढ़े घोल में बीज को अच्छी तरह से मिला लें जिससे प्रत्येक बीज के ऊपर उर्वरक की पतली परत बन जाए। बीज को छायादार स्थान पर 10-15 मिनट तक सुखाने के बाद बीज की बुबाई कर दें। पौध उपचार – एक एकड़ में पौध रोपण के लिए 1 कि.ग्रा. जैव उर्वरक का 10-15 ली. पानी में घोल बनाया जाता है, इसमें 250-300 ग्राम या चीनी का प्रयोग करते हैं। जिसमें पौधों की जड़ों को 10-15 मिनट तक डुबा कर रखते हैं तत्पश्चात् तुरंत ही रोपाई करते हैं। टमाटर, मिर्च, प्याज एवं बैंगन में इस प्रकार के उपचार की संस्तुति की जाती है।
इसी प्रकार में अदरक के किस्म नदिया, मरान, जोरहाट सुप्रभा, प्याज के किस्म आरएच-5, स्वर्णा सहित सहित धनिया, मेंथी, कटहल, शीताफल सहित अन्य औषधीय फसलों की जानकारी एवं उनके फायदों के बारे में भी अवगत कराया गया।
साथ ही किसानों को एक जिला उत्पाद के हल्दी के बारे में अवगत कराते हुए बताया गया कि इसका उपयोग भोजन के प्रमुख तत्व के रूप में, दर्दनाशक, मधुमेह के उपचार सहित अन्य औषधीय कार्य के रूप में किया जाता है। प्रशिक्षण में कृषकों को बताया गया कि हल्दी के खेती के लिए मानसून की पहली वर्षा होते ही भूमि को तैयार किया जाता है। खेत को फसल योग्य बनाने के लिये भूमि चार बार गहराई से जोतना चाहिये।
दुमट मिट्टी में 500 कि.ग्रा./हेक्टेयर की दर से चूने के पानी का घोल डाल कर अच्छी जुताई करना चाहिये। मानसून के पूर्व वर्षा होते ही तुरन्त लगभग एक मीटर चौड़ी, 15 से.मी. ऊँची तथा सुविधानुसार लम्बी बेड को तैयार कर लेते है। इन बेडों के आपस में एक दूसरे से बीच की दूरी 50 से.मी. होनी चाहिये। इसी प्रकार अन्य जानकारियों से भी अवगत कराया गया।
इस अवसर पर सहायक संचालक उद्यान मदन सिंह परस्ते, उद्यान अधीक्षक एस.पी. सिंह, ग्रामीण विस्तार अधिकारी विक्रम कलमेश, शिखा शर्मा, वैज्ञानिक डॉ. मृगेन्द्र सिंह, डॉ. बीके प्रजापति एवं कृषि वैज्ञानिक तथा कृषकगण उपस्थित रहें।



